Wednesday, October 1, 2008

गांधी जी के कलयुगी बन्दर


6 comments:

दर्द-ए-दर्द said...

यामिनी,
अभी मात्र १४ वर्ष की हो, और कंटेंट बहुत अच्छा है. हालाँकि लाइनिंग प्रोपर नही है. पर प्रयास करोगी तो सुधर जायेगी. छोटी उमर में भी अच्छी सोच और ब्लॉग अपडेट रखने के लिए शुभकामनाये.
- संदीप

Udan Tashtari said...

बढ़िया है, जारी रहो!!

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

yah namoona chitra kahaan se mila, badhiya hai...

Anil Pusadkar said...

बहुत बढिया।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपके बन्दर मेरे बन्दरों से ज्यादा सच्चे हैं। सत्यार्थमित्र पर देखिए।
...मूड नहीं है तो कोई बात नहीं। यही बाँचिए-(ताजी लाइनें हैं)


ले झाँक गि़रेबाँ ऐ कातिल, रमजान भी जाने वाला है।
बापू शास्त्री का दिवस मना पड़ चुकी गले में माला है॥

मज़हब को क्यूँ बदनाम करे, खेले क्यूँ खूनी खेल अरे।
आँगन में मस्जिद एक ओर, तो दूजी ओर शिवाला है॥

क्यों हाथ कटार लिया तूने,क्यों कर तेरे हाथ में भाला है?
कहाँ पाक-कुरान को छोड़ दिया,कहाँ तेरी वो जाप की माला है?

जब आज नमाज अता करना,या गंगाजी से जल भरना।
तो ऊपर देख लिया करना, बस एक वही रखवाला है॥